देवभूमि उत्तराखंड इस समय सदी की सबसे भीषण प्राकृतिक आपदा का सामना कर रही है। पिछले 48 घंटों से जारी मूसलाधार बारिश और बादल फटने की श्रृंखला ने राज्य के गढ़वाल और कुमाऊं मंडलों में मौत का तांडव मचाया है। आपदा की स्थिति इतनी विकराल है कि मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा ने इसे 'हिमालयी सुनामी' करार दिया है।सबसे दुखद और भयावह खबरें केदारनाथ धाम से आ रही हैं। प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार, गांधी सरोवर के ऊपर बादल फटने से आए पानी और मलबे के रेले ने मंदिर के आसपास स्थित रामबाड़ा और अन्य पड़ावों का नामो-निशां मिटा दिया है। केदारनाथ मंदिर सुरक्षित बताया जा रहा है, लेकिन मंदिर परिसर के चारों ओर कई फीट मलबा और पत्थर जमा हो गए हैं। रामबाड़ा, जो कि केदारनाथ का मुख्य पड़ाव था, पूरी तरह बह चुका है। वहां मौजूद सैकड़ों दुकानों और होटलों का कोई सुराग नहीं मिल रहा है।मंदाकिनी, अलकनंदा, भागीरथी और पिंडर नदियाँ अपने उफान पर हैं। रुद्रप्रयाग में अलकनंदा और मंदाकिनी के संगम पर स्थित भगवान शिव की विशाल प्रतिमा पानी के तेज बहाव में विलीन हो गई है। ऋषिकेश और हरिद्वार में भी गंगा खतरे के निशान से काफी ऊपर है। नदियों के किनारे बने सैकड़ों मकान, बहुमंजिला होटल और पुल ताश के पत्तों की तरह ढह गए हैं। उत्तरकाशी और चमोली जिलों में भूस्खलन के कारण सैकड़ों सड़कें बंद हैं, जिससे राहत कार्य में भारी बाधा आ रही है।
चारधाम यात्रा के मुख्य मार्गों पर करीब 70,000 से अधिक श्रद्धालु फंसे होने की खबर है। संचार व्यवस्था पूरी तरह ठप होने के कारण लोग अपने परिजनों से संपर्क नहीं कर पा रहे हैं। बद्रीनाथ, गंगोत्री और यमुनोत्री धामों का संपर्क भी शेष दुनिया से कट गया है। सेना, आईटीबीपी (ITBP) और एनडीआरएफ (NDRF) की टीमें रेस्क्यू ऑपरेशन में जुट गई हैं, लेकिन खराब मौसम और लगातार हो रही बारिश के कारण हेलीकॉप्टर उड़ान नहीं भर पा रहे हैं।राज्य सरकार ने हाई अलर्ट जारी कर दिया है। देहरादून के जौलीग्रांट एयरपोर्ट को रेस्क्यू ऑपरेशन का केंद्र बनाया गया है। गृह मंत्रालय ने सेना के एमआई-17 हेलीकॉप्टरों को तैनात किया है, लेकिन बादलों के कारण दृश्यता शून्य होने से फंसे हुए लोगों तक भोजन और दवाइयां पहुँचाना नामुमकिन हो रहा है।अगले 24 घंटों के लिए मौसम विभाग ने अभी और भारी बारिश की चेतावनी जारी की है, जिससे लोगों की चिंताएं और बढ़ गई हैं। यह आपदा न केवल उत्तराखंड के लिए, बल्कि पूरे देश के लिए एक बड़ी परीक्षा की घड़ी है, क्योंकि मलबे के नीचे दबे और नदियों में बहे लोगों का सही आंकड़ा अभी तक रहस्य बना हुआ है।







