भारत और ऑस्ट्रेलिया के बीच रणनीतिक साझेदारी को नई मजबूती देते हुए ऑस्ट्रेलिया ने भारत को यूरेनियम निर्यात के लिए आवश्यक प्रशासनिक मंजूरी पूरी कर दी है। दोनों देशों के प्रधानमंत्रियों नरेंद्र मोदी और एंथनी अल्बनीज़ की मौजूदगी में इस समझौते को अंतिम रूप दिया गया। इसके साथ ही करीब एक दशक से लंबित परमाणु ईंधन सहयोग अब व्यवहारिक रूप से लागू होने का रास्ता साफ हो गया है।
यह फैसला इसलिए ऐतिहासिक माना जा रहा है क्योंकि भारत ने अब तक परमाणु अप्रसार संधि (Nuclear Non-Proliferation Treaty – NPT) पर हस्ताक्षर नहीं किए हैं। लंबे समय तक ऑस्ट्रेलिया की नीति रही कि वह केवल NPT पर हस्ताक्षर करने वाले देशों को ही यूरेनियम बेच सकता है। इसी वजह से भारत को ऑस्ट्रेलियाई यूरेनियम उपलब्ध नहीं हो सका था। हालांकि 2014 में दोनों देशों के बीच असैन्य परमाणु सहयोग समझौते पर हस्ताक्षर हुए थे, लेकिन प्रशासनिक और नियामकीय प्रक्रियाओं के कारण इसका क्रियान्वयन अब तक अटका हुआ था।
भारत को यह छूट इसलिए मिली क्योंकि वह 2008 में परमाणु आपूर्तिकर्ता समूह (NSG) से विशेष छूट प्राप्त कर चुका है। इसके अलावा भारत ने अपने असैन्य परमाणु संयंत्रों को अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (IAEA) की निगरानी में रखा है। ऑस्ट्रेलिया ने भी स्पष्ट किया है कि उसका यूरेनियम केवल शांतिपूर्ण और ऊर्जा उत्पादन संबंधी उद्देश्यों के लिए ही इस्तेमाल किया जाएगा तथा उस पर अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा मानकों का पालन होगा।
ऊर्जा सुरक्षा के लिहाज से यह समझौता भारत के लिए बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है। भारत आने वाले वर्षों में परमाणु ऊर्जा उत्पादन क्षमता में तेज़ी से विस्तार करना चाहता है और वर्ष 2047 तक लगभग 100 गीगावाट परमाणु ऊर्जा क्षमता का लक्ष्य रखा गया है। इसके लिए स्थिर और भरोसेमंद यूरेनियम आपूर्ति आवश्यक है। ऑस्ट्रेलिया दुनिया के सबसे बड़े ज्ञात यूरेनियम भंडार वाले देशों में शामिल है, इसलिए यह साझेदारी भारत के दीर्घकालिक ऊर्जा कार्यक्रम को मजबूती दे सकती है।
यह समझौता केवल ऊर्जा तक सीमित नहीं है। दोनों देशों ने रक्षा सहयोग, हिंद-प्रशांत क्षेत्र में समुद्री सुरक्षा, महत्वपूर्ण खनिज (Critical Minerals), हरित ऊर्जा, आपूर्ति श्रृंखला (Supply Chain) और उन्नत प्रौद्योगिकी के क्षेत्रों में भी सहयोग बढ़ाने पर सहमति जताई है। इससे भारत-ऑस्ट्रेलिया व्यापक रणनीतिक साझेदारी को नया आयाम मिलने की उम्मीद है।
विशेषज्ञों का मानना है कि रूस, कज़ाखस्तान और कनाडा जैसे देशों के बाद ऑस्ट्रेलिया से भी यूरेनियम आपूर्ति शुरू होने से भारत के परमाणु ईंधन स्रोत अधिक विविध और सुरक्षित होंगे। इससे किसी एक देश पर निर्भरता कम होगी और ऊर्जा सुरक्षा मजबूत होगी। साथ ही यह समझौता चीन की बढ़ती क्षेत्रीय सक्रियता के बीच भारत और ऑस्ट्रेलिया के रणनीतिक सहयोग को भी और गहरा करने का संकेत देता है।
हालांकि भारत अभी भी NPT का सदस्य नहीं है, लेकिन इस समझौते से यह स्पष्ट संकेत मिलता है कि वैश्विक स्तर पर भारत को एक जिम्मेदार परमाणु शक्ति के रूप में स्वीकार्यता लगातार बढ़ रही है। वर्षों तक चली बातचीत के बाद ऑस्ट्रेलिया का यह निर्णय दोनों देशों के रिश्तों में एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर माना जा रहा है और इससे भारत की स्वच्छ ऊर्जा, ऊर्जा सुरक्षा तथा सामरिक साझेदारी—तीनों को एक साथ मजबूती मिलने की उम्मीद है।








